Thursday, 20 September 2012

किसको दोखा दे रहो हो भाई !



1

छोटे/मझोले किसानों को खाद तक नहीं मिल पा रहा है/धान-गेहूं को बिचौलियों के माध्यम से बेचना पड़ता है/समर्थन मूल्य तक नहीं मिल पाता
सरकारी सुविधाएँ बड़े किसानों सीमित रहती हैं.इसमें से अधिक किसान बहुधंधी हैं.इसका लाभ खास वर्ग ही उठा पा रहा है.फिर कांग्रेस किस मुंह से कह रही है वाल-मार्ट/एफडीआई के आने से किसानों का उद्धार हो जायेगा/
उनका सदियों का दलिद्दर दूर हो जायेगा...

2
मीडिया के मंच पर फेल रहा भारत बंद का कवरेज :
कारण-
1.ममता बनर्जी के प्रेसवार्ता का लाइव प्रसारण 
2.अन्ना-अरविन्द के बीच दरार बढ़ाने पर फोकस 
3.पाकिस्तान के डिप्लोमैटिक इन्क्लेव में स्थित अमेरिकी दूतावास के पास प्रदर्शन का लाइव प्रसारण 
4. लेफ्ट-बीजेपी के एक मंच पर आने को लेकर अधिक विश्लेषण 
5.पहली बार भारत बंद के जरूतर पर मूल्यांकन....
6.गणपति विसर्जन का लाइव कवरेज ...

3
भारत बंद: 
रौशनी नीलाम करके पूछते हो,
कहो आफताब क्या हाल है ...? (अज्ञात)

4
जनता के नाम पर ढोंग करने वाले रंगासियारों को पहचानिये और समझिए.चुनाव में इन्हें एक जोर का धक्का दीजिए..
जागो जनता जागो....!

5
गैस कनेक्शन देने वाली एजेंसियां कितनी चोरी/धांधली करती हैं/आवश्यकता न होने के बावजूद सिलेंडर के साथ चूल्हा देने के नाम पर मनमानी तरह से लूटती हैं.... २५०० की जगह ५५००-६००० रुपये लेती हैं .कहीं-कहीं इससे अधिक में भी लेती हैं...
उन्हें सिर्फ पैसा दीजिए,दस्तावेज न हो तो भी कनेक्शन मिल जायेगा....
इस पर कोई क्यों नहीं बोलता ....?

6
कुछ चैनल भारत बंद को 'महाबंद' बता रहे हैं.ममता कह रही हैं बंगाल में बंद का असर नहीं रहा.
महाराष्ट्र का बयान है गणपति के वजह से बंद नहीं था.
शेष जानकारी बंद को देखने वाले दे सकते हैं .......

7
एफडीआई का अंधा विरोध करने वाले देशी बनियों/व्यापारियों/चोरों/कालेबाजारियों/ के बारें चुप हैं...क्यों ?
इसका राज़ क्या है ...?

8
कोटेदार जनता को घोषित चीनी /मिट्टी का तेल/ अनाज नहीं देता/चोरी करता है.
प्रधानों /नेताओं/ दबंगों/जिलापूर्ति अधिकारीयों के साथ मिलकर घालमेल करता है....कालेबाजारी करता है.इसके खिलाफ लोग क्यों नहीं बोलते ....?

9
यहीं भाजपा थी,80 रुपये तक टमाटर बेची थी.
कांग्रेस-भाजपा महंगाई की दादी-नानी हैं ....
इनको पहचानिये,बिचौलिए/बहुरूपिये पार्टियों से बचिए ........
समय आने पर जोर का धक्का दीजिए ....

10
भारत बंद में शामिल लोगों को देख रहा हूँ.इसमें वे लोग नहीं दिख रहे हैं,जिनके चेहरे पर झुर्रियाँ हो,पीठ पर फटी गंजी और नंगे पैर...
जिनके नाम पर भारत को बंद किया गया है...या जिनके नाम पर संसद को ठप रखा गया...अधिकतर चेहरे टमाटर/सेब/गुलाब की तरह लालीमा लिए युक्त दिख रहे हैं...लकदक कुर्ता पायजामा/खादी/लिनेन/रेशम/मटका/सिल्क /काटन/...पहने...घूम फिरकर तो यहीं दिखते हैं ...पढ़ने वाले 'लिंग' परिवर्तन करके भी पढ़ सकते हैं....

11
यदि इस मुल्क में तस्वीर देखकर जनता वोट देती तो शहीद-ए-आजम भगत सिंह एवं साथियों के नाम पर लोग चुनाव नहीं लड़ते,जीतते और सरकार बनाते...
अन्ना किस भ्रम में हैं ...?

Sunday, 9 September 2012

असम पर आक्रामक और खंडवा पर खंड-खंड राष्ट्रीय मीडिया


  पानी में ज़िंदा लाश बनी आंदोलनकारी जनता के मुद्दे पर दिनौनी से पीड़ित मीडिया  



डॉ. रमेश यादव

9 सितम्बर,2012 नई दिल्ली.
 मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के घोघल गाँव में 15 दिनों से पुनर्वास की मांग को लेकर जल सत्याग्रह  

मीडिया और मुद्दे 

गुवाहाटी,असम,दक्षिण भारत,मुंबई विरोध प्रदर्शन,गीतिका-कांडा प्रकरण,कोल ब्लाक आवंटन और चाँद-फिज़ा पर दिन रात फ़िदा,भंवरी के भंवरों की तलाश.अन्ना और रामदेव के अभियान में दिन-रात फ्लैश मारते कैमरे / मीडिया को पानी में ज़िंदा लाश बनी आंदोलनकारी जनता दिख क्यों नहीं रही है...?

 उपरोक्त मुददों पर आक्रामक दिखने वाला राष्ट्रीय मीडिया मध्य प्रदेश के खंडवा पर खंड-खंड की मुद्रा में क्यों दिख रहा है...? यहाँ मीडिया दिनौनी का शिकार है या फिर टीआरपी का गुलाम...? 

इतना कठिन तप तो संभवतः भागीरथ ने भी गंगा को धरा पर लाने के लिए नहीं किया होगा,जितना कठिन तप खंडवा के लोग पानी से पुनर्वास के लिए कर रहे हैं.
    
जल प्रेम में डूबी मध्य प्रदेश सरकार को 15 दिनों से जल में सत्याग्रह कर रही जनता की फिक्र नहीं है.इस मुद्दे को राष्ट्रीय मीडिया उस निगाह से नहीं कवर कर रहा है,जिस आक्रामक अंदाज़ में असम और उससे जुड़ी घटनाओं को कवर किया.

हालाँकि दो दिन पूर्व हमने एनडीटीवी के रिपोर्टर को पानी में हेलकर आंदोलनकारी महिला-पुरुषों से बात करते  
हुए देखा था.बावजूद इसके खंडवा पर देश का ध्यान आकर्षित करने और सरकार को जन के पक्ष में निर्णय लेने के लिए दबाव बनाने में मीडिया असफल रहा है.
   
गौरतलब है  
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के घोघल गाँव में नर्मदा बचाओ आंदोलन का जल सत्याग्रह 15 दिनों से पुनर्वास की मांग को लेकर 50 से अधिक लोग आंदोलनकारी पुरुष-महिलाएं पानी में बैठे हैं.

क्या है मामला 
ओंकारेश्वर में 189 मीटर और इंदिरा सागर बाँध में 260 मीटर पानी भरा जा रहा है.इससे खंडवा और हरदा जिले के कई गाँव डूब क्षेत्र में आ गए हैं.इनमें घोघल भी शामिल है. यहाँ पुनर्वास कार्य पूरे नहीं हुए हैं.नर्मदा बचाओ आन्दोलन के कार्यकर्ता 2011 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करने की मांग कर रहे हैं.कोर्ट ने कहा था कि पुनर्वास शासन और नर्मदा घाटी विकास बोर्ड की संवैधानिक जिम्मेदारी है.        

जल,जंगल,जमीन और जन विद्रोही सरकारों का चरित्र 
निरंतर गाँधीवादी माला जपने वाली कांग्रेस पार्टी और केंद्र की यूपीए सरकार को खंडवा में गाँधीवादी आंदोलन के रास्ते अपनी मांग पर पानी में बैठे लोगों के प्रति कोई चिंता नहीं है.सरकार ने 15 दिनों में कोई सार्थक हस्तक्षेप नहीं किया है.

मानवतावाद की ठेकेदार आरएसएस की गोद से पैदा भाजपा/मध्य प्रदेश सरकार मानवतावाद के खिलाफ खड़ी नज़र आ रही है.15 दिनों में भाजपा सरकार ने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया,जिसे लोकतान्त्रिक कदम कहा जाये.

चुप हैं क्यों महिलावादी गढ़ और मठ ?  
जल सत्याग्रह में सिर्फ पुरुष ही शामिल नहीं हैं,बल्कि बड़ी संख्या में महिलायें भी हैं,लेकिन महिलाओं के हित में काम करने वाली संस्थाओं ने उक्त मुद्दे पर अपना मुख खोलना मुनासिब नहीं समझा.बात-बात उबलते भात की तरह भद-भदाने वाली संस्थाओं को डर है कि कहीं सरकारी सुविधाएँ/फंड ने छीन जाये.पुरस्कार से वंचित न रह जाएँ.     

लोकतंत्र में लोक का दर्द
लोकतंत्र में लोक के दर्द को सरकारें निरंतर अनसुना कर रही हैं और पूंजीवादी संस्थाओं/व्यवस्थाओं के लिए काम कर रही हैं.
सरकार के इस कदम से लोक का हित प्रभावित हो रहा है.सरकारें पूंजीवादी हितों का संरक्षण कर रही हैं.
खेदजनक बात तो यह है की बहुत सारे मसलों पर आक्रामक मीडिया जनवादी मुददों पर चुप्पी साधे हुए है.

आज जरुरत है खंडवा की जनता के साथ खड़े होने की.     





Thursday, 30 August 2012

टीवी चैनल का झांसा,आसाराम ने फेंका नया पासा

जीवनरक्षक मंत्र प्रभावी है तो इसका राष्ट्रीयकरण करो,
झूठ है तो आसाराम बापू को गिरफ्तार करो !   

रमेश यादव  
30 अगस्त,2012.नई दिल्ली।

आज शाम 8.26 बजे को न्यूज 24 पर एक खबर चल रही थी-'मंत्र ने बचाई हवा में जिंदगी','मंत्र जापकर हवा में बच गए' 

पूरी खबर देखने पर समझ में आया कि कल बुधवार को आसाराम बापू  हेलीकॉप्टर दुर्घटना में बाल-बाल बच गए।उनके सहित कुल पांच लोग उसमें सवार थे।   

अब इसे न्यूज चैनल ने किस तरह से परोसा।बानगी देखिये।एक पत्रकार पूछ रहा है-'उस मंत्र शक्ति के बारे में बताइए,जिसके जाप से आप बच गए'.आसाराम बताते हैं-यह अकाल मृत्यु-मंत्र का कमाल है।चैनल ने उन्हें,मंच पर उछल-उछलकर अपने भक्तों को जीवन रक्षक मंत्र के बारे में बताते दिखाया।चैनल ने इसे ईश्वरीय चमत्कार से जोड़कर  भी दिखाया और इसे शिगूफा भी बताया। 
   
सवाल उठता है-क्या हकीकत में कोई मंत्र है,जिसके सहारे दुर्घटना के समय जापकर बचा जा सकता है ? यदि हाँ तो आसाराम बापू ने इसके बारे में देश को क्यों नहीं बताया ? इस अमूल्य ज्ञान को अपने तक सीमित क्यों रखे रहे ?    

यदि उक्त मन्त्र को बताये होते,जिसकी जाप से वे बचे तो कम से कम सेना के नौ लोगों के जान को बचाया जा सकता था या वे बच सकते थे।  

गौरतलब है कि गुजरात के जामनगर के पास हुई एक हवाई दुर्घटना में भारतीय वायु सेना के दो हेलिकॉप्टर हवा में उड़ान भरने के बीच आपस में टकरा गए.इस हादसे में वायुसेना के नौ अधिकारियों की मौत हो गई जबकि तीन अन्य घायल हुए हैं.

अब सवाल उठता है कि आसाराम बापू ने जीवन रक्षक मंत्र का प्रयोग सिर्फ अपने लिए क्यों किये ? जबकि वे खुद को अध्यात्मिक गुरु के तौर पर प्रचारित करते हैं और धर्मार्थ समाजसेवा का दंभ भरते हैं। 

सरकार को आसाराम बापू के हेलीकॉप्टर दुर्घटना की जाँच करानी चाहिए।पता लगाना चाहिए कि किन परिस्थतियों/वजहों से वे वे बाल-बाल बचे।

यह कोई मंत्र का कमाल था या कुछ और ? 
यदि उनके बचने में जीवन रक्षक मंत्र का कमाल था तो इस मंत्र का राष्ट्रीय कारण करना चाहिए और इसका प्रयोग हर तरह के दुर्घटना में/के समय प्रयोग करना चाहिए। ताकी जान माल की रक्षा की जा सके। 

और यदि उक्त मंत्र प्रभावहीन है/ अप्रभावी है/ भ्रम है तो आसाराम बापू को गिरफ्तार कर उनके ऊपर जनता को बरगलाने/अंध आस्था/भ्रम फ़ैलाने का मुक़दमा चलाना चाहिए।   

  

Friday, 24 August 2012

समस्याओं के कब्र पर ज़िंदा हैं संस्थाएं


डॉ. रमेश यादव

२४ अगस्त,२०१२, नई दिल्ली.

यूएनडीपी/यूनीसेफ/यूनेस्को और इन जैसी तमाम अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं दुनिया में आम आदमी के शिक्षा/स्वास्थ्य/जनसँख्या नियंत्रण /गरीबी/भूखमरी/मानवाधिकार /बेहतरी से जुड़े ढेर सारे क्षेत्रों में काम करती हैं.

लेकिन इनका मकसद/उद्देश्य उक्त विषयों के अध्ययन/सर्वे/फिल्ड विजिट /प्रकाशन/फाइलिंग/मीडिया कवरेज/कार्यशाला/सेमिनार आदि तक सीमित रहता है.या अपने आपको यहीं तक सीमित रखती हैं.

इन संस्थाओं द्वारा जब भी कोई कार्यक्रम आयोजित किया जाता है.मसलन कार्यशाला/सेमिनार रिपोर्ट रिलीज/मीडिया से बातचीत.ये सारे कार्यक्रम 3 स्टार होटलों में आयोजिते होते/किये जाते हैं.इससे कम में कोई चाह कर भी नहीं कर सकता.क्योंकि ये उनके समझौते में शामिल होता है,फंडिंग एजेंसीज के साथ.

ये संस्थाएं उक्त कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए जब भी विषय विशेषज्ञों/जानकारों / विशेष मेहमानों को आमंत्रित करती हैं,तो उनके ठहरने की व्यवस्था 4 स्टार होटलों में करती हैं.

यानी आयोजन स्थल और ठहरने के स्थान में एक स्टार का फर्क होना चाहिए.इस तरह के कार्यक्रमों में जो लोग भाग लेते हैं,वे अपने-अपने क्षेत्र में आम-अवाम के लिए संघर्षरत चेहरा /चिन्तक/सिद्धांतकार/कार्यकर्ता/हमदर्द होने का तमगा लिए घूम रहे होते हैं/रहनुमा समझे जाते हैं,लेकिन दरअसल ये असली मायने में परिवर्तनकारी होने का खोल ओढ़े होते हैं.    
 
अब आप समझ गए होंगे कि इन्हीं कामों के प्रबंधन में पूरे बजट का करीब 70 से 80 फीसदी खर्च हो जाता है.
लेकिन जिसके लिए ये काम करते हैं/जिनके नाम पर प्रोजेक्ट लेते /चलाते हैं,उनके जीवन स्तर में कोई बदलाव नहीं हो पाता.अपवादों को छोड़कर.

अब आप सवाल उठा सकते हैं कि जिनके लिए ये काम करते हैं,उनके बीच में क्यों नहीं अपने गतिविधियां संचालित करते हैं.

हमें उनके उद्येश्यों के बारे में ठीक-ठीक जानकारी नहीं है,लेकिन जहाँ तक समझ पा रहा हूँ.इनका मकसद किसी भी समस्या को फंडिंग निगाह से देखना/आंकड़े जुटाना/ उजागर करना और इसी बहाने बने रहना/ ज़िंदा रहना है.

अगर ऐसा नहीं होता तो जब से ये संस्थाएं जन्म ली हैं/ काम कर रही हैं,तब से यदि ये जमीनी स्तर पर प्रभावित व्यक्ति को सीधे लाभ पहुंचाई होतीं तो तमाम समस्याएं कब की खत्म हो गई होती.

लगता है जब तक समस्याएं हैं तब तक ये संस्थाएं हैं.समस्याएं रहेंगी तभी ये संस्थाएं रहेंगीं/फलेंगी-फूलेंगी.इसलिए ये संस्थाएं कभी नहीं चाहेंगीं की समस्याएं समाप्त हों....

अगले भाग में इन संस्थाओं द्वारा संचालित कार्यक्रमों और उससे जुड़ी समस्याओं के बारे में बताएँगे.      
      








           

Friday, 13 July 2012


 प्रस्तुत लेख 'विकास और मुद्दे' पुस्तक में प्रकाशित है,जिसका लोकार्पण 28 जून,2012 को टीएमयु,मुरादाबाद में हुआ.यहाँ टुकड़े-टुकड़े  में प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि लोगों को पढ़ने में सुविधा रहे.सम्पूर्ण विवरण लेख के अंत में दिया जायेगा.  
    
खूंखार पूंजी से लथपथ मुख्यधारा के 
मीडिया का विकल्प बनता सोशल मीडिया
 
रमेश यादव

सूचना और प्रसारण मंत्रालय इस साल के फरवरी तक 825 चैनलों को लाइसेंस दिया है.इस समय 681 चैनल्स प्रसारित हो रहे हैं.फ़िलहाल देश में करीब 430 न्यूज और करंट अफेयर्स चैनलों को प्रसारण की अनुमति दी गई है.देश और प्रदेश के स्तर से हजारों समाचार-पत्र और सकड़ों पत्रिकाएं पंजीकृत हैं और सैकड़ों प्रकाशित हो रही हैं.इसके आलावा सरकारी नियंत्रण वाला दूरदर्शन और आकाशवाणी है,जो देश के सर्वाधिक भू-भाग तक पहुँच का दावा करता है.

अब सवाल उठता है कि इतने बड़े मीडिया समूहों के संजाल के बावजूद क्या वजह है कि देश की अस्सी फीसदी जनता इस सूचना संसार से बहिस्कृत है ? और पूरी की पूरी सूचना व्यवस्था बीस फीसदी लोगों के इर्द–गिर्द मंडरा रही है. 
मौजूदा मीडिया के पूरे तस्वीर को देखिये तो लगता है,इसके परिधि में महानगर है.शहर है.बालीवुड-हालीवुड है और इसका सपनीला संसार है.मनोरंजन है.फैशन है.पूंजी के सौदागर हैं. राजनीति है.लोकतंत्र है और इसके रहनुमा हैं.एकदम कड़ी भेष में लकदक.खाए-पिए, और अघाये लोगों का डकार लेता पूरा का पूरा सुखमय जीवन संसार है.पूरा मीडिया इन्हीं के गणेश परिक्रमा पट टीका है और इन्हीं से संजीवनी लेकर जिंदा है.  

इस मीडिया में नहीं दिखता तो बस- उजड़ता हुआ गाँव,धरती को चीरता किसान,भूख से रिरियाती हथेली.खेतिहर-मजदूर,श्रमिक,  आत्महत्या करता किसान.दवा के आभाव में दम तोड़ता आम आदमी.बेरोजगारी से जूझता नौजवान.अपने ही घर और समाज में शोषित होती स्त्री की आवाज़.कुपोषण के शिकार बच्चे.नष्ट और खत्म होते खेत-खलिहान.
बेहतर शिक्षा,रोजगार और स्वस्थ्य की उम्मीद में आस लगाये अवाम. आर्थिक आत्मनिर्भरता,सामाजिक बराबरी,राजनैतिक अधिकार और साहित्यिक-सांस्कृतिक समानता के लिए संघर्षरत जनता.जरा सोचिये! आखिर ये ही तो भारतीय समाज व्यवस्था के नीवं हैं,फिर ये मुख्यधारा के मीडिया का विषय क्यों नहीं बन पा रहे हैं ?   

जाहिर है,यह दौर मिशनरी पत्रकारिता का नहीं है.यह व्यावसायिक और व्यापारिक पत्रकारिता का अंधा युग चल रहा है.मौजूदा मीडिया पूंजी से संचालित हो रहा है,इसलिए इसकी मूल जरुरत पूंजी और मुनाफा है.यहीं कारण है कि इस दौर का मीडिया खूंखार पूंजी से लथपथ है.कार्ल मार्क्स ने कभी ठीक ही कहा था कि ‘पूंजीपति वर्ग उस जोंक के समान है,जो दूसरों का खून पीकर जिन्दा रहता है’ मौजूदा समय में इसका गंभीरता से पड़ताल कीजिये तो देखिएगा,मीडिया में पूंजी लगाने वाला वर्ग जोंक की तरह ही खून चूस रहा है.
      
यहीं कारण है कि भारतीय मीडिया आम आदमी के पक्ष में काम करने की बजाय भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण के साम्राज्यवादी फैलाव-विस्तार में सहयोगी की भूमिका अदा कर रहा.खूंखार पूंजीवाद से लथपथ मुख्यधारा का मीडिया आर्थिक मुनाफा और व्यावसायिक विस्तार के लिए राजसत्ता से गठजोड़कर का मुख्य एजेंडा बना रखा है.
इसीलिए इसके अंदर सामाजिक सरोकार की जगह सामाजिक बहिस्कार की भावना काम कर रही है.यहीं कारण है कि सोशल मीडिया एक नए विकल्प के तौर पर सामने आया है.       

वर्तमान मीडिया का तीन स्वरुप देखने को मिल रहा है.पहला जनपक्षधर मीडिया,दूसरा मुख्यधारा का मीडिया या कारपोरेट मीडिया.जिसमें प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया शामिल है.तीसरा सोशल मीडिया है.जिसमें फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग.न्यूज पोर्टल आदि शामिल हैं.
जनपक्षधर मीडिया की पहुँच सीमित है,लेकिन इसका सरोकार बेहद जनवादी है.आमतौरपर इसका संचालन वामपंथी संगठनों और नागरिक समाज द्वारा किया जा रहा है. 




क्रमश जारी... 


Sunday, 17 June 2012

परमाणु बम है पर पानी नहीं



     

रमेश यादव
१८ जून,नई दिल्ली  
हमारे पास 
परमाणु बम है 
मिसाइल है 
पब है 
बार है
रेस्तरा है 
मेट्रो है 
हाईवे है 
देश की राजधानी है 
पर 
पीने का पानी नहीं है ....?
फक्र कीजिये.हमारे मुल्क के पास परमाणु बम है.मिसाइल है. लेकिन लोगों को पीने के लिए पानी नहीं है.गाँव-कस्बों को छोड़िये,देश की राजधानी प्यासी है.एक-दो दिन से नहीं,हफ़्तों से.इस मसले पर लोकतान्त्रिक सरकारें असमर्थ-असहाय और असंवेदनशील दिख रही हैं.संभवतः यह अपने आप में अनोखी राष्ट्रीय राजधानी होगी.हमारे जानकारी के मुताबिक दूसरे मुल्कों की राजधानियों की कम से कम ऐसी स्थिति तो नहीं ही होगी.  
राजधानी में सब कुछ तो है.पब हैं.बार हैं.रेस्तरा हैं.मेट्रो है.ओवर ब्रिज हैं.माल है.पार्क हैं,उसमें संगीत मयी फौवारे हैं.स्विमिंग पुल है.दुधिया रोशनी में जगमगाती हसीन रात है.घोटाले के लिए पैसे हैं.पानी के प्रोजेक्ट के लिए विश्व बैंक है.फिर भी लोगों को ४५-४६ तापमान में गला तर करने के लिए पानी नहीं है.
जो पानी मिल भी रहा है,वह इतना भयंकर शुद्ध है कि निरोगी  आदमी को भी रोगी बना दे.गलती से किसी सुबह किसी बर्तन में पानी रखकर भूल जाइये,वापस शाम को आइए,उस बर्तन को देखिये.सफेदी आपका इंतज़ार कर रही होगी.टीडीएस इतना की क्या कहना.
इस शहर का अपना क्या है ? मानसून बंगाल की खाड़ी से उमड़ते-घुमड़ते,केरल के रास्ते,मुंबई होते हुए दस्तक देता है.गर्मी राजस्थान के अरावली पहाड़ियों से टकराते हुए यहाँ चिंगारी फेंकती है.सर्दी कश्मीर-शिमला से आती है.पड़ोसी राज्यों,मसलन हरियाणा आदि के नहर का पानी न आये तो यहाँ जो पानी मिल रहा है,वह भी सपना हो जाये.
जो भो हो,सरकारें आदमी को मूलभूत सुविधायें भले न दे रही हों लेकिन भ्रष्टाचार,लूट और घोटाले की नदी जरुर बहा रही हैं.आप किनारे बैठ कर उन्हें टुकुर-टुकुर देखते रहिये और जब चुनाव आये तो जाति,क्षेत्र,धर्म,भाई-भतीजावाद और पार्टी के नाम पर वोट देते रहिये और विजेता बनाते रहिये ...? आप के हाथ में वोट देने की मजबूरी-लाचारी के अलावा और है ही क्या ?
बड़े बुजुर्ग कहते थे.पुण्य कमाना है तो आदमी को अपने जीवन में पांच पेंड़ और एक कुआँ जरुर खुदवाना चाहिए.लोगों ने इसे पुण्य और आस्था सो जोड़ दिया ताकी लोग यह काम बखूबी करें.इसका प्रमाण मेरे पास है.मेरे परदादा.उस ज़माने में दो कुआं खुदवाए,जब सुखा पड़ता था,लोग पानी की जगह दूध पीते थे.बाद के दिनों में इसी कुएं से पहले मोट और अब मशीन से सिंचाई होने लगी और आज भी इस कुएं का पानी जीतना मीठा और शीतल है.उतना हेम मालिनी के आर.ओ. का भी नहीं होगा.
पहले लोग तालाब का निर्माण करवाते थे.पोखरा खुदवाते थे.मेरे गाँव में ३६ बीघे का पोखरा था,आज भले लोग उसे पाटकर घर बना लिए हों,लेकिन कई अब भी सुरक्षित हैं.
इसे सुरक्षित और संरक्षित रखने के लिए जो परियोजनाएं आती हैं,वो कागज पर ही संपन्न हो जाती हैं.ब्लाक के अधिकारीयों और ग्राम प्रधान की कृपा से.  
शहरों में जो तालाब थे,उसे पाटकर भूमाफियाओं-दबंगों ने माल,फ़्लैट आदि बना लिए.बनारस के लोग मोती झील को याद कर सकते हैं.सरकार के स्तर पर पोखरा-तालाब के लिए सक्रिय और सार्थक कदम नहीं उठाये गए.
जब पानी ही संरक्षित नहीं रहेगा तो लोगों को पानी मिलेगा कहाँ से.सरकार सब कुछ कर रही है,लेकिन इस दिशा में क्यों नहीं कुछ करना चाहती है.
जल,जंगल और जमीन की दुश्मन सरकार के खिलाफ भी लोगों को दोस्त बनकर इस समस्या के हल के लिए लड़ना होगा.अब इसे जल के लिए युद्ध कहिये या और कुछ नाम दीजिए.यहीं एक मात्र विकल्प है.    
     

Wednesday, 13 June 2012

राष्ट्रपति चुनाव: राय सीना के लिए राष्ट्रीय कीच-कीच


रमेश यादव 
13 जून,2012,नई दिल्ली.
  
भारत के मुकाबले अमरीकी राजनीति और रणनीति के दशा-दिशा में कितना अंतर है...?
अमेरिका में नवंबर २०१२ में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होना है,जबकि भारत में १९ जुलाई २०१२ को.
बावजूद इसके वहां करीब एक साल पहले से राजनैतिक गतिविधियां चल रही हैं.
भारत में अभी उम्मीदवार तक तय नहीं हुआ है.
अमेरिका में कमोबेश रिपब्लिकन और डेमोक्रेट पार्टी के उम्मीदवार पानी में उतराते तेल की तरह दिख रहे हैं.
भारत में यूपीए चेयरपरशन,जिसका नाम सलेक्ट कर रही है,सहयोगी पार्टियां,उसे रिजेक्ट करने में लगे हैं.
फ़िलहाल तो यहीं स्थिति दिख रही है.
ममता बनर्जी तुनक मिजाज़ जरुर हैं,लेकिन उनका सार्वजनिक राजनैतिक जीवन सादगी भरा है.उनकी छवि लड़ाकू,जुझारू और संघर्षशील है.कुछ मामलों को छोड़ दें तो आमतौर पर उनका कदम और निर्णय आम आदमी के पक्ष में होता है.
मुलायम सिंह यादव तपे हुए संघर्ष की भट्ठी से निकले हुए एक अनुभवी और अखाड़ेबाज नेता हैं.उनको पता है कि कौन सा दांव  किसको,कब और कैसे मारना है,खास तौर पर धोबियापाट.उनके राजनैतिक पैतरेबाजी को भी इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए.
आज ममता बनर्जी और मुलायम सिंह ने मिलकर जो दांव चली है,उसकी कल्पना राजनीतिक पंडित नहीं किये थे.
सोनिया गाँधी से मिलकर जब ममता बनर्जी निकली तो उनके पास सोनिया के सुझाये दो नाम थे,प्रणव मुखर्जी और हामिद अंसारी.
लेकिन जब वे मुलायम सिंह के साथ मीटिंग करके प्रेस के सामने प्रकट हुईं तो उनके पिटारे में तीन नए नाम थे,एपीजे अब्दुल कलम,मनमोहन सिंह और सोमनाथ चटर्जी.          
मजेदार बात देखिये,ममता ने प्रेस से कहा कि देश का राष्ट्रपति इज्जतदार,ईमानदार और संविधान का जानकार हो.उसे देश की जानकारी हो ताकी अच्छा काम कर सके.उनके इस वक्तव्य का मायने तो वहीँ लोग लगा पाएंगे,जो इनकी खूबियों को जानते हैं.
अब सवाल उठता है कि ममता और मुलायम के इस तात्कालिक साठ-गांठ के पीछे का राजनैतिक चाल क्या है ?
यह कदम पैकेज लेने के लिए है या फिर मुलायम सिंह और ममता ने कांग्रेस से अतीत की बेइज्जती का बदला ले रहे हैं.
क्या ममता ने प्रणव के काट के लिए सोमनाथ चटर्जी का नाम आगे किया.मनमोहन का नाम कांग्रेस को झुकाने के लिए किया गया,जबकि अब्दुल कलाम का नाम दोनों ने मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने के लिए किया है...?
जब पत्रकारों ने पूछा कि इन तीनों में आप लोगों की पहली पसंद कौन है तो ममता ने बताने से इंकार कर दिया.
इसके और कई मायने हो सकते हैं.लेकिन राजनीति तो ऊंट की तरह है.पहले से कैसे बताया जाये ?
कांग्रेस की घाघपना देखिये,अभी तक अधिकारिक तौर पर किसी नाम की घोषणा नहीं की है.प्रणव और अंसारी का नाम ममता के मुख से निकला है.कांग्रेस के मुख से नहीं.