Monday, 4 June 2012

समाजवाद !



समाजवाद !


इस बार के चुनावी मौसम में
एक दिन मैं
गाँव में घूम रहा था
देखा एक जगह बैठे बुजुर्गों का एक झुण्ड
चुनावी चर्चा में मशगुल था
हमारी भी दिलचस्पी बढ़ी
बीच-बीच में हम भी कुछ कहने लगे
एक बुजुर्ग बोले
चुप रहो
तुम क्या जानोगे ?
इस बार सच्चा समाजवाद आएगा
पूरे मुलुक में रौशनी ही रौशनी होगी.
उनकी बात सही निकली
समाजवाद आया
और
पूर्ण बहुमत के साथ आया
मैं
कई महीने बाद
एक दिन
उन्हीं बुजुर्ग के घर से गुजर रहा था.
शाम ढल रही थी
देखा वे चारपाई पर बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे हैं...
मैं
उनके पास गया और प्रणाम किया..
वे बोले खुश रहो बेटवा,कैसे हो,बैठो..
मुझे देखते ही
वे पता नहीं क्या इधर-उधर ढूंढने लगे
मैंने पूछा
क्या खो गया है 'बाबा' ?
समाजवाद ढूंढ रहे हैं क्या ?
वे खिसियाये और बच्चे को आवाज लगाये चंदुआ लाठिया कहाँ है रे...
मैं
अँधेरे का लाभ उठाया और सरक लिया
मन ही मन सोच रहा था
अच्छा हुआ समाजवाद नहीं आया था...?


रमेश यादव / 04/06/2012/3.48PM./ नई दिल्ली

2 comments:

डॉ.सुनीता said...

क्या खो गया है 'बाबा' ?
समाजवाद ढूंढ रहे हैं क्या ?
वे खिसियाये और बच्चे को आवाज लगाये चंदुआ लाठिया कहाँ है रे...
मैं
अँधेरे का लाभ उठाया और सरक लिया
मन ही मन सोच रहा था
अच्छा हुआ समाजवाद नहीं आया था...?

समाजवाद के चेहरे पर गुदगुदाती हुआ तमाचा लाजबाब है...
सादर..!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत खूब सर!


सादर