Wednesday, 30 May 2012

वर की तलाश में घर भर



जब भी आती हूँ घर  
वर की तलाश में लग जाता है घर भर
आजकल
मेरे लिए लड़का देखा जा रहा है
लगन का सीजन जो चल रहा है
माता-पिता मौन हैं
वे देखना चाहते हैं
मुझे
छूते हुए शिखर को
मेरे
भाई-भौजाई परेशान हैं
रोज एक नया लड़का
खोज लाते हैं
खिलौने की तरह
कहते हैं
इसे पसंद करो
उसे पसंद करो
पहला वाला डाक्टर है
दूसरा वाला इंजीनियर  
तीसरा वाला लेक्चरर है
चौथा वाला बिजनेसमैन
बड़े अच्छे स्वाभाव हैं सबके  
एक दम
पुरुषोत्तम राम की तरह
ताजिंदगी सुख देंगे
मैं
सभी को नीचे से ऊपर तक देखती हूँ
फिर बोलती हूँ
थोड़ा वक़्त चाहिए
जिंदगी भर के फैसले का सवाल है
भाई बोलते हैं
कब तक सोचने का बहाना करती रहोगी
तुमें
सोचते–सोचते बीत गए ११ साल  
अब २९ की हो चली हो
किसी को तो हाँ कह दो
इतने अच्छे रिश्ते बार-बार नहीं आते
मैं
जानती हूँ
अपने भाइयों की खूबी
वे  
देखना चाहते हैं
मेरी मांग में
एक किलो सिंदूर
और
गले में मंगल सूत्र का बंधा पट्टा   
और भाभियाँ
वहीँ तो लिखती हैं
इस षड़यंत्र की पटकथा
कितनी मजबूर होती है
एक लड़की
जब करना होता है
उसे मनचाहे
जीवन साथी का चुनाव
अपने ही हो जाते हैं पराये
जब फैसला न हो उनके अनुकूल
देते हैं दुहाई
इज्ज़त और मर्यादा का
मूल्यों और परम्पराओं का
रौंद देते हैं
अपने ही पैरों तले
खुद के बगिया का फुल
इस बार
फिर बच निकली हूँ
एक अवसर और मांगी हूँ
माँ और पिता से
भाई फिर नाराज़ हैं
भाभियाँ बैठी हैं
कोप भवन में
मैं
निकल पड़ी हूँ
एक बार फिर
खुले गगन में 


रमेश यादव
सृजन /१८ /05/२०१२/वाराणसी /सतीश का कमरा    

2 comments:

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

सटीक और झकझोरने वाला लिखे हैं सर!


सादर

Sonal Rastogi said...

waah