Wednesday, 30 January 2013

आज़ाद नैहर,गुलाम ससुराल ?


एक लड़की
या
स्त्री 
नैहर में आज़ाद रहती है
या 
ससुराल जाते ही गुलाम बन जाती है
या 
नैहर से गुलाम आती है और
ससुराल पहुंचते ही
आज़ाद हो जाती है
या दोनों जगहों पर 
गुलामी और आज़ादी का
पलड़ा बराबर रहता है...
क्या यह मामला गाय नुमा
लड़की/स्त्री पर ही लागू होता है 
या समाज के सभी तरह की स्त्रियों पर
यह एक मनोवैज्ञानिक शोध है य धारणा  
यह पुरुषवादी ढांचे का एतिहासिक हकीकत है
या सामाजिक-सांस्कृतिक बुनावट का परिणाम
कुछ खास वर्ग की स्त्रियों का मामला है
या सम्पूर्ण समाज का आईना    
यह सिर्फ भारत का मामला है या एशिया का
यूरोप का या अमेरिका का
समाजवादी देशों का
या साम्यवादी देशों का  
एक मुल्क का या सभी का
अविकसित का या विकासशील का
या फिर विकसित राष्ट्रों का....(विस्तार और संशोधन संभव)


यह लिख ही रहा था कि अचानक कड़कती हुई आकाशवाणी हुई.लड़की/स्त्री नैहर में माँ-बाप और भाई के इशारे पर नाचती है और ससुराल में उसे सास नामक जीव मिलती है,जिसके सामने होठ पर टांका लगा का ताजिंदगी गुजारनी पड़ती है.एक-दो विसंगतियाँ हों तब न बतायी जाये...

  DRY/31/01/2013/08:59am.

1 comment:

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 02/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!